✨श्री सीताराम लक्ष्मण✨

 
✨श्री सीताराम लक्ष्मण✨
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बलि जाउँ, और कासों कहौं? सदगुनसिंधु स्वामि सेवक-हित कहुँ न कृपानिधि-सो लहौं।1। जहँ तहँ लोभ लोल लालचबस निजहित चित चाहनि चहौं। तहँ तहँ तरनि तकत उलूक ज्यों भटकि कुतरू-कोटर गहौं।2। काल सुभाउ करम बिचित्र फलदायक सुनि सिर धुनि रहौं। मोको तौ सकल सदा एकहि रस दुसह दाह दारून दहौं।3। उचित अनाथ होइ दुखभाजन भयो नाथ! किंकर न हौं। अब रावरो कहाइ न बूझिये , सरनपाल !साँसति सहौं।4। महाराज! राजीवबिलोचन! मगन-पाप-संताप हौं। तुलसी प्रभु! जब तब जेहि तेहि बिधि राम निबाहे निरबहौं।5।
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